当前位置:首页 > মাধ্যমিক রেসাল্ট ট২৩

...जब बीजेपी के समर्थन से लालू यादव बने थे बिहार के सीएम

आज बिहार की सियासत हो या राष्ट्रीय राजनीति का परिदृश्य,जबबीजेपीकेसमर्थनसेलालूयादवबनेथेबिहारकेसीएम हर जगह लालू यादव को बीजेपी के मुखर विरोधी के रूप में जाना जाता है लेकिन सियासत में सबकुछ हमेशा एक जैसा नहीं रहता. आज जो दल या नेता दोस्त हैं वो कभी विरोधी खेमे में दिख सकते हैं तो आज के दुश्मन कभी सियासी दोस्त. ऐसी ही सियासी दोस्ती और दुश्मनी का नजारा कभी बिहार ने भी देखा था. जब लालू यादव को सीएम की कुर्सी बीजेपी के समर्थन से मिली थी.हम बात कर रहे हैं सियासत के उस दौर की जब हर राजनीतिक दल का मुकाबला कांग्रेस से होता था और कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए तमाम विपक्षी दल उसके खिलाफ एकजुट हो जाया करते थे. जैसे आज मोदी और बीजेपी विरोध के नाम पर 20 से अधिक विपक्षी दल अपने मतभेद भुलाकर भी एक साथ एक मंच पर अक्सर दिख जाते हैं.बात है साल 1990 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव की. इमरजेंसी के विरोध में जब देश में मंडल आंदोलन की लहर थी और दूसरी ओर बीजेपी कमंडल की राजनीति को धार देने में जुटी थी. लेकिन कांग्रेस विरोध के मामले पर दोनों एकजुट थे. केंद्र में वीपी सिंह की अगुवाई में जनता दल की सरकार चल रही थी और बीजेपी का समर्थन उसे हासिल था.इसी बीच बिहार में विधानसभा का चुनाव हुआ. तब झारखंड का हिस्सा भी बिहार राज्य में ही था. 324 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ कांग्रेस को सिर्फ 71 सीटें मिलीं. बहुमत के लिए कम से कम 163 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी. जनता दल को 122 सीटें मिलीं, लेकिन बहुमत के लिए उसे और सीटों की जरूरत थी.बीजेपी के 39 विधायक जीतकर पहुंचे थे. केंद्र की वीपी सिंह सरकार की तर्ज पर बीजेपी ने बिहार में भी जनता दल सरकार को समर्थन दिया. जनता दल में चली रस्साकस्सी के बीच पार्टी के अंदर हुई वोटिंग में पूर्व मुख्यमंत्री राम सुंदर दास को हराकर लालू यादव नेता चुने गए. 10 मार्च 1990 को लालू पहली बार बिहार के सीएम की कुर्सी पर बैठे. इसी के साथ लालू ने बिहार में कांग्रेस पार्टी के शासन का खात्मा कर दिया.हालांकि, लालू के साथ बीजेपी का ये साथ लंबा नहीं चल सका. जल्द ही कांग्रेस विरोध की ये दोस्ती मंडल बनाम कमंडल की राजनीति का शिकार हो गई. सोमनाथ से अयोध्या के लिए निकले लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को लालू ने 23 सितंबर 1990 को समस्तीपुर में रुकवा दिया और आडवाणी को गिरफ्तार करा दिया. लालू के इस कदम के बाद बीजेपी ने केंद्र की वीपी सिंह सरकार और बिहार के लालू यादव की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.बीजेपी के इस कदम से केंद्र की वीपी सिंह की सरकार तो गिर गई, लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव अपना किला बचाने के लिए बड़ा दांव खेल गए. उन दिनों प्रदेश बीजेपी के बड़े नेता हुआ करते थे, इंदर सिंह नामधारी. नामधारी लालू के समर्थन में आ गए और बीजेपी में टूट हो गई. नामधारी का गुट लालू प्रसाद यादव के समर्थन में आया और इस तरह लालू ने अपनी कुर्सी बचा ली.यहीं से लालू ने अपनी सियासत का नया दांव खेला. कमंडल विरोध की राजनीति को लालू ने अपना मुख्य हथियार बनाया. लालू ने पिछड़े और मुस्लिम वोटों को मिलाकर M+Y समीकरण का व्यूह रचा और उसी के बल पर बिहार में 15 साल तक राज किया.बीजेपी का साथ छूटा तो बाद के दौर में कांग्रेस लालू यादव के समर्थन में आ गई. कांग्रेस के साथ लालू ने केंद्र की सरकार में भी साझेदारी की. 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव भी आरजेडी ने कांग्रेस और जेडीयू के साथ मिलकर लड़ा था और जीत भी मिली थी. लेकिन नीतीश कुमार के जुलाई 2017 में बीजेपी के साथ चले जाने से महागठबंधन की सत्ता भी चली गई.अभी लालू यादव रांची के रिम्स में हैं और बिहार के सियासत की रणनीति को वे वहीं से साध रहे हैं. इस बार के बिहार चुनाव में भी लालू यादव की पार्टी आरजेडी और कांग्रेस एक साथ उतर रही हैं. महागठबंधन का चेहरा तेजस्वी यादव हैं. वहीं उनका मुकाबला मुख्य रूप से बीजेपी-जेडीयू की जोड़ी से होता दिख रहा है. चुनाव करीब है तो एक बार फिर बिहार में दलबदल और खेमेबदली का दौर भी तेज हो गया है. चुनाव से ऐन पहले हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के जीतनराम मांझी महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए में चले गए हैं.

分享到: